मुखड़ा

खाली जगह’ – यह नाम अजीब लगता है. सैकड़ों नामों पर चर्चा के बाद इस पर सहमती बनी थी, जब इसे एक सहयोगी ने अचानक ही देर रात सुझाया. तब उम्मीद की जा रही थी कि इस नाम से एक हिंदी पत्रिका निकाली जाए. कवर पेज से लेकर हर पेज परिशिष्ट का ढाँचा तैयार कर लिया गया.

परन्तु, ट्रायल-डमी इशू निकलने के ठीक पहले वह साँचा नहीं बन पाया. सप्ताह में दो बार कभी घास पर कभी बेंच पर तो कभी सोफे पर पानी-चाय-चिप्स-कोक-समोसे की बैठकें भी हुई. फिर भी जगह खाली ही रह गयी.

khalijagah team @ work

बहरहाल, जैसा कई बार होता है… शुरू शुरू में बड़ी-बड़ी बातें होती हैं …और फिर ताश के पत्तों का महल बन नहीं पाता. धीरे-धीरे उर्जावान साथियों की उर्जा अलग-अलग चली गई और रह गई हमारे पास सिर्फ यह ‘खाली जगह’. ख़ुशी इस बात की है कि इन्हीं में से कुछ साथी अपना हांफता जोश ‘भारत बोलेगा’ प्रोजेक्ट में लगाए हुए हैं, जिनके हम शुक्रगुज़ार हैं.

…तारीखें मिटी, साल मिटे, सदियां मिटी…

…नहीं मिटी तो रात की तारीख़ बदलने की आदत…

…नहीं मिटी तो उस एक तारीख़ पर हमारे मिटने की आदत…

…नहीं मिटी तो ख़त्म होने के बाद शुरू होने की अदा…

– एक सहयोगी के 1 जनवरी, 2012 के नव वर्ष शुभकामना ई-मेल से.

अब इंतज़ार है उस समय का जब खबरों की भीड़ में ‘खाली जगह’ की पहचान बनेगी… इसी नाम से या फिर… कुछ पता नहीं. …कल किसने देखा है! तब तक ‘खाली जगह’ एक कुंवारी अभिव्यक्ति रहेगी.

– नीरज भूषण / mail@neerajbhushan.com

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